Saturday, July 24, 2021

कम्प्यूटर की मूल संरचना | Basic Structure Of Computer – Best Info In Hindi

कम्प्यूटर की मूल संरचना | Basic Structure Of Computer – Best Info In Hindi

कम्प्यूटर की मूल संरचना – यदि हम ध्यान दें, तो पाएंगे कि कम्प्यूटर कुछ सूचनाओं को प्राप्त करता है, फिर निश्चित निर्देशों का प्रदत्त क्रम में पालन करते हुए सूचना पर आधारित आवश्यकतानुसार गणना एवं उसका विश्लेषण करके शुद्ध एवं सत्य परिणाम प्रस्तुत करता है। कम्प्यूटर सूचनाओं को प्राप्त करने के लिए इनपुट डिवाइसों, गणना एवं विश्लेषण करने के लिए विश्लेषक इकाई तथा परिणाम प्रस्तुत करने के लिए आउटपुट डिवाइसों का प्रयोग करता है।

कम्प्यूटर के भाग  (Computer Parts)

संरचनात्मक दृष्टिकोण से कम्प्यूटर को निम्नलिखित तीन भागों में बांटा जा सकता है-

  • सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (Central Processing Unit) 
  • इनपुट डिवाइसेस (Input Devices)
  • आउटपुट डिवाइसेस (Output Devices)

सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (Central Processing Unit)

सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (Central Processing Unit) को हिन्दी में केन्द्रीय विश्लेषक इकाई भी कहा जाता है। इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह कम्प्यूटर का वह भाग है, जहां पर कम्प्यूटर प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण किया जाता है। सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (सी.पी.यू.) को पुनः तीन भागों में बांटा जा सकता है-

  1. कन्ट्रोल यूनिट (Control Unit)
  2. ए.एल.यू. (Airtmetic & Logical Unit – ALU)
  3. मेमोरी (Memory)

1- कन्ट्रोल यूनिट (Control Unit)

कन्ट्रोल यूनिट का कार्य कम्प्यूटर की इनपुट एवं आउटपुट डिवाइसों को नियन्त्रण में रखना है। इनपुट डिवाइसों से सूचनाओं को प्राप्त करना, इन्हें कम्प्यूटर के समझने योग्य संकेतों में बदलना, इन्हें ALI में भेजना, मेमोरी का उचित प्रयोग करना तथा ALU से विश्लेषण के उपरान्त प्राप्त परिणामों को करना इसका मुख्य कार्य है। कन्ट्रोल यूनिट के मुख्य कार्य अग्रलिखित हैं-

  • आउटपुट डिवाइसों तक भेजना, आउटपुट डिवाइसों को परिणाम को प्रस्तुत करने के लिए निर्देशित सर्वप्रथम इनपुट डिवाइसों की सहायता से सूचना/डेटा को कन्ट्रोलर तक लाना।
  • कन्ट्रोलर द्वारा सूचना / डेटा को मेमोरी में उचित स्थान प्रदान करना।
  • मेमोरी से सूचना/डेटा को पुनः कन्ट्रोलर में लाना एवं इन्हें ALU को भेजना।
  • ALU से प्राप्त परिणामों को आउटपुट डिवाइसों पर भेजना एवं समृति में उचित स्थान प्रदान करना।

कम्प्यूटर में आंकड़ों का संचयन (Data Storage In Computer)

कम्प्यूटर में सूचना/डाटा/आंकड़ों का संचयन एवं अनन्तरण इलैक्ट्रिकल एवं इलैक्ट्रॉनिक पुर्जी द्वारा किया जाता है। ट्रांजिस्टर, इन्टीग्रेटेड सर्किट (I.C.), संधारित्र (Capacitor), प्रतिरोधक (Resistor) आदि इलैक्ट्रॉनिक परिपथ के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। ट्रांजिस्टर और I.C. स्विचिंग प्रक्रिया पर आधारित कार्य करते हैं अर्थात् वे किसी विशेष परिस्थिति में ON रहते हैं एवं किसी अन्य परिस्थिति में OFF रहते हैं। यह दोनों परिस्थितियां इलैक्ट्रिकल वोल्टेज की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति निश्चित करती हैं।

इन परिस्थितियों के लिए दो अंक निश्चित किए गए हैं-0 (शून्य) तथा 1 (एक)। इन दोनों अंकों के आधार पर ही, कम्प्यूटर विभिन्न गणनाएं एवं विश्लेषण करता है। इस प्रणाली को द्विअंकीय अथवा बायनरी प्रणाली (Binary System) कहा जाता है। कम्प्यूटर को दिये गये समस्त सूचनाओं एवं निर्देशों को सर्वप्रथम बायनरी अंकों (Binary Digit) में बदला जाता है।

तब इन्हें ALU में भेजा जाता है। ALU से विश्लेषित परिणामों को ALU पुन: Binary Digit से प्रस्तुत करता है, परन्तु Controller इन परिणामों को Binary Digit से पुन: परिवर्तित कर पूर्व रूप में आउटपुट डिवाइस द्वारा प्रस्तुत करता है। बायनरी प्रणाली में प्रत्येक अंक अर्थात् 0 से 1 एक बिट (Bit) कहा जाता है। बिट Binary Digit का ही संक्षिप्त रूप है। यदि किसी बायनरी संख्या 5 अंक हैं तो वह 5 बिट की संख्या कहलाती है। इसी प्रकार 6 अंकों वाली बायनरी संख्या 6 बिट की संख्या, 7 अंकों वाली बायनरी
संख्या 7 बिट की संख्या कहलायेगी, जैसे-

100100            6 बिट की बायनरी संख्या

110010010      9 बिट की बायनरी संख्या |

कम्प्यूटर की मूल संरचना | Basic Structure Of Computer – Best Info In Hindi
कम्प्यूटर की मूल संरचना | Basic Structure Of Computer – Best Info In Hindi

कम्प्यूटर की मूल संरचना | Structure Of Computer

अंग्रेजी अक्षरों एवं विशेष चिन्हों को कम्प्यूटर में ASCII विधि द्वारा निरूपित किया जाता है। यह अंग्रेजी के अक्षरों एवं विशेष चिन्हों को बायनरी पद्धति में लिखने की विधि है। इसका पूरा नाम American Standard Code for Information Interchange है।

इस विधि में बायनरी अंक समूह आठ अंकों में लिखा जाता है। इन आठ अंकों में से पहले चार अंक क्षेत्र (Zone) एवं शेष चार अंक संख्यात्मक (Numeric) होते हैं। जब हम कम्प्यूटर को कोई भी निर्देश किसी इनपुट माध्यम से देते हैं तो कम्प्यूटर स्वतः इन निर्देशों को एस्काई कोड में परिवर्तित कर समझता है। निर्देश देने के लिए हमें सामान्यतः अक्षरों, संख्याओं एवं संकेतों की ‘कीज़’ को की-बोर्ड पर दबाना होता है और
कम्प्यूटर स्वतः ही इसे अपनी भाषा में परिवर्तित कर लेता है।

कम्प्यूटर का यह भाग कम्प्यूटर की आन्तरिक क्रियाओं का संचालन करता है। यह इनपुट तथा आउटपुट क्रियाओं को नियन्त्रित करने के साथ-साथ मेमोरी और ए.एल.यू. के मध्य डेटा का आदान-प्रदान को निर्देशित भी करता है।

सिस्टम में कन्ट्रोल सिग्नल को बदल कर डेटा पर उचित ऑपरेशन किया जा सकता है यह प्रोग्राम को क्रियान्वित करने के लिये प्रोग्राम के निर्देशों को मेमोरी में से प्राप्त करना है। निर्देशों को विद्युत-संकेतों (Electrical Signals) में परिवर्तित करके यह उचित डिवाइसेज़ तक पहुंचाता है जिससे डेटा प्रक्रिया का कार्य सम्पन्न हो जाये। कन्ट्रोल यूनिट का कार्य, ए.एल.यू. को यह बताना कि प्रक्रिया हेतु डाटा, मेमोरी में कहां उपस्थित है, क्या क्रिया करनी है तथा प्रक्रिया के पश्चात परिणाम मेमोरी में कहां संग्रहीत होना है।

ए.एल.यू. (Arithmetic & Logical Unit-ALU)

कम्प्यूटर को गणना करने का एक उत्कृष्ट साधन के रूप में स्थापित हुआ था। अब प्रश्न ये उठता है कि ऐसा कम्प्यूटर में क्या लगाया गया है कि कम्प्यूटर बड़ी-से-बड़ी गणना को भी सरलता से करके हमें परिणाम दे देता है। तो इस प्रश्न का उत्तर हम कुछ इस प्रकार से दे सकते हैं कि कम्प्यूटर में एक ऐसी इकाई होती है जिसमें किसी भी प्रकार की सभी गणना की जा सकती है और इस इकाई को ए.एल.यू. (Arithmetic Logic Unit-A.L.U.) कहते हैं। कम्प्यूटर की वह इकाई जहां सभी प्रकार की गणनाएं की जा सकती हैं, अर्थमेटिक एण्ड लॉजिकल यूनिट कहलाती है।

कम्प्यूटर की मूल संरचना

कम्प्यूटर गणित के दो प्रमुख सिद्धान्त हैं—पहला, सभी प्रकार का अंकगणित (जोड़, घटाना, गुणा, भाग) एक तरह के जोड़ द्वारा कर लिया जाता है; एवं दूसरा, ऐसा करने के लिये हमें 1 व 0 के अंकों को जोड़ना होता है जिससे 1 एवं 0 अंक प्राप्त होते हैं। इसके अलावा हासिल और पूरक भी प्राप्त करने होते हैं। कम्प्यूटर में सभी कार्य लॉजिक गेट (Logic Gates) के द्वारा किये जाते हैं। अंकगणितीय कार्यक्रम सम्पन्न करने के लिए कई तरह के लॉजिक गेट्स को मिलाकर इलेक्ट्रॉनिक परिपथ बनाया जाता है। गेट कई प्रकार के होते हैं जैसे AND गेट, OR गेट, NOT गेट इत्यादि।

  • AND गेट आउटपुट सिग्नल ‘1’ तब देता है जब इसका कोई भी इनपुट सिगनल ‘1’ हो।
  • NOT गेट आउटपुट उसके इनपुट का उलटा होता है।
  • OR गेट आउटपुट सिग्नल ‘1’ तब देता है जब इसका कोई भी इनपुट सिगनल ‘0’ हो।


एक गेट का आउटपुट दूसरे गेट में इनपुट के रूप में प्रयोग कर तथा गेट्स को विभिन्न तरीकों से जोड़कर अंकगणितीय गणना में सक्षम परिपथ (Circuit) बनाये जा सकते हैं। कुल मिलाकर हमें चार कार्य करने होते हैं-

  • 0 + 1 में 0 योग एवं 0 का हासिल प्राप्त करना। 
  • 0+ 1 में 1 का योग एवं 0 हासिल प्राप्त करना।
  • 1 + 0 में योग एवं 0 का हासिल प्राप्त करना।
  • 1+1 में 1 योग एवं 0 का हासिल प्राप्त करना।

ऐसे गेट्स जो उपरोक्त कार्य कर सकें, अंकगणितीय कार्य सम्पन्न कर सकते हैं। ALU के लॉजिक सेक्शन को लॉजिक गेट्स से अलग मानना चाहिये। यह वह सेक्शन होता है जो प्रोग्राम के सही चलने में सहायता करता है।

मेमोरी (Memory)

किसी भी निर्देश, सूचना अथवा परिणाम को संचित करके रखना ही मेमोरी (Memory) कहलाता है। मनुष्य के मस्तिष्क का भी एक भाग मेमोरी के लिए प्रयोग होता है। यदि उसे कोई गणना करनी है तो जिन संख्याओं की गणन-क्रिया की जानी है, उनको पहले मेमोरी में रखा जाता है, और फिर गणना के उपरान्त परिणामों को मेमोरी में रखने के बाद ही उत्तर दिया जाता है। अत: स्पष्ट हैं कि मेमोरी मनुष्य मस्तिष्क में दिये जाने वाले संदेशों, सूचनाओं, निर्देशों आदि को संचित कर रखने वाला एक भाग है। कम्प्यूटर द्वारा भी वे सभी कार्य कराये जा सकते हैं, जिनको हम अपने मस्तिष्क में करते हैं।

कम्प्यूटर के सी.पी.यू. (CPU) में होने वाली समस्त क्रियायें सर्वप्रथम मेमोरी (Memory) में जाती हैं। तकनीकी रूप में मेमोरी कम्प्यूटर का कार्यकारी संग्रह (Working Storage) है। मेमोरी कम्प्यूटर का अत्यधिक महत्वपूर्ण भाग है जहां डाटा, सूचना और प्रोग्राम प्रक्रिया के दौरान स्थित रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल उपलब्ध होते हैं। मेमोरी को प्राथमिक मेमोरी (Primary Memory) या मेन मेमोरी (Main Memory) भी कहते हैं। मेमोरी में संग्रह के लिये अनेक स्थान (Locations) होते हैं जिनकी संख्या निश्चित होती है।

यह मेमोरी की क्षमता या मेमोरी का आकार (Memory Size) कहलाता है, जैसे- 256 KB, 512 KB, 768 KB, 1.2 GB, 4GB आदि प्रत्येक स्थान Location) का एक पता (Address) होता है। मेन मेमोरी (Main Memory) एक सेमीकडक्टर (Semi-Conductor Chip) होती है।

मेमोरी की इकाई मेमोरी की क्षमता को नापने वाली इकाई BIT, BYTE, KB, MB एवं GB होती हैं। O BIT-यह कम्प्यूटर की मेमोरी की सबसे छोटी इकाई है। यह मेमोरी में एक बायनरी अंक 0 अथवा 1 को संचित किया जाना प्रदर्शित करता है। यह Binary Digit का सूक्ष्म रूप है।

बाइट BYTE  यह कम्प्यूटर की मेमोरी की मानक इकाई है। कम्प्यूटर की मेमोरी में की-बोर्ड से दबाया गया प्रत्येक अक्षर, अंक अथवा विशेष चिह ASCII Code में संचित होते हैं। प्रत्येक ASCII Code 8 Bit का होता है। इस प्रकार किसी भी अक्षर को मेमोरी में संचित करने के लिए 8 Bit मिलकर 1 Byte बनती हैं। 

  • OKB-KB का अर्थ है किलोबाइट; 1KB, 1024 Byte के बराबर होती है।
  • MB-MB का अर्थ है मेगाबाइट: 1MB, 1024 KB के बराबर होती है।
  • OGB-GB का अर्थ है गेगाबाइट; 1GB, 1024 MB के बराबर होती है।

मेमोरी के प्रकार (Types Of Memory)

कम्प्यूटर की मूल संरचना – मेमोरी दो प्रकार की होती हैं-अस्थाई मेमोरी (Temporary Memory) तथा स्थाई मेमोरी (Permanent Memory)

अस्थाई मेमोरी (Temporary Memory) जब हम कम्प्यूटर को ON करके कोई सूचना देते हैं, तो वे कम्प्यूटर की मेमोरी में संचित की जाती हैं। जब तक कमाण्ड द्वारा वे सूचनायें मिटायी न जायें अथवा कम्प्यूटर को OFF न किया जाये, तब तक वे सूचनायें कम्प्यूटर की मेमोरी में संचित रहती हैं। कम्प्यूटर को OFF करते ही ये सूचनायें मेमोरी से साफ हो जाती हैं। यह समस्त सूचनायें कम्प्यूटर RAM पर संचित होती हैं।

कम्प्यूटर में RAM पर सूचनायें संचित करने के लिए हमें किसी कमाण्ड की आवश्यकता नहीं होती। जो भी सूचना किसी इनपुट डिवाइस द्वारा कम्प्यूटर को दी जाती है, वह तुरन्त RAM में जाकर संचित की जाती है। चूंकि इस प्रकार की मेमोरी में संचित सूचनाओं को कम्प्यूटर को पुन: ON करने पर प्रयोग नहीं कर सकते, अतः इसे अस्थाई मेमोरी कहा जाता है। RAM को कम्प्यूटर की Basic Memory भी कहा जाता है।

स्थाई मेमोरी (Permanent Memory) जब हम कम्प्यूटर को ON करते हैं तो मॉनीटर स्क्रीन पर कुछ संदेश प्रदर्शित होते हैं। कम्प्यूटर में सर्वप्रथम RAM की जांच होती है। यदि उसमें कोई खराबी है तो उससे सम्बन्धित संदेश का स्क्रीन पर प्रदर्शन होता है अथवा ध्वनि संकेत प्राप्त होता है। इसके बाद कम्प्यूटर से जुड़े आवश्यक इनपुट-आउटपुट डिवाइसेज जैसे की-बोर्ड, फ्लॉपी-ड्राइव आदि को बारी-बारी से चैक करता है और अगर इनमें से कोई डिवाइस खराब हो गई, या ठीक से न जुड़ी हो, तो कम्प्यूटर की स्क्रीन पर यह निर्देश उपस्थित होता है, कि फ्लॉपी-ड्राइव में DOS (ऑपरेटिंग सिस्टम) की फ्लॉपी लगाकर की-बोर्ड की कोई भी कुंजी दबा दें।

यह सभी निर्देश एवं संदेश जो कम्प्यूटर हमें दर्शा रहा है, वह कम्प्यूटर की परमानेंट मेमोरी में स्टोर रहते हैं। साथ ही कुछ प्रोग्राम भी ROM में रहते हैं, जिनके अनुसार निर्देश मिलने पर उपरोक्त ‘मैसेज स्क्रीन पर प्रदर्शित होते हैं। कम्प्यूटर को चाहे जितनी बार ऑन या ऑफ किया जाए, इस प्रोग्राम पर जो कम्प्यूटर की स्थाई मेमोरी (Permanent Memory) ROM पर स्थित है, कोई।

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